गुरुवार, 26 सितंबर 2019

Tagged Under: ,

विश्वास और प्रयास के सहारे आशा देवी ने लिखी बदलाव की कहानी

लेखक: अपना समाचार दिनांक: सितंबर 26, 2019
  • शेयर करे

  • अब गांव की स्थिति बदल चुकी है। आये दिन रात में एम्बुलेंस की आवाज आसानी से सुनी जा सकती है। प्रसव घर की जगह अस्पतालों में होने लगे हैं। कभी टीकाकरण के नाम से माताएं अपने बच्चे को घर में छिपा लेती थीं। आज नज़ारा बिल्कुल बदल गया है। माताएं खुद बच्चे को प्रत्येक महीने की बुधवार एवं शुक्रवार को ग्रामीण स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण दिवस पर ले जाकर बच्चों का टीकाकरण करा रही हैं। सुनने में तो यह एक सामान्य सी ही घटना लगती है। लेकिन जिले के कोढा ब्लॉक के कोलासी गांव के लिए यह एक बड़े बदलाव का संकेत है। इस बदलाव को सच करने में आंगनबाड़ी केंद्र संख्या-158 की सेविका आशा देवी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
    पुरानी प्रथाएं बन रही थी वजह : इस बदलते दौर में घर पर प्रसव कराना जागरूकता के आभाव को दिखाता है। साथ में सरकार के सामने मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाने की दिशा में मौजूद चुनौतियों को भी दर्शाता है। कोढा ब्लॉक के कोलासी गांव की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। गाँव से कुछ दूरी पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है। सड़कें गाँव को अस्पताल से जोड़ती भी है। इन सब के बाद भी घर पर होने वाले प्रसव की संख्या अधिक थी। आशा देवी ने इस दिशा में कार्य करना शुरू किया। अपने पोषक क्षेत्र की सभी गर्भवती महिलाओं की लिस्ट तैयार की। सभी गर्भवती महिलाओं के घर जाकर सबसे बात करना शुरू किया। इससे उन्हें ज्ञात हुआ कि घर पर प्रसव कराना लंबे समय से चले आ रही प्रथा का हिस्सा था। घर के पुरुष सदस्य के साथ महिलाएं भी घर पर प्रसव कराने के पक्ष में ही थे।
    जागरूकता बनी बदलाव की वजह : आशा देवी ने घर के पुरुष सदस्यों से बात करना शुरू की। उन्हें संस्थागत प्रसव के फ़ायदों के बारे में जानकारी दी। निःशुल्क एम्बुलेंस से घर से अस्पताल एवं प्रसव के बाद अस्पताल से घर आने के विषय में बताया। प्रति प्रसव सरकार द्वारा दिये जाने वाले 1400 रुपए की प्रोत्साहन राशि पर भी विशेष ज़ोर दिया। साथ ही गृह प्रसव के कारण प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं को भी विस्तार से बताया। धीरे-धीरे लोगों की मानसिकता में बदलाव देखने को मिला। घर की बुजुर्ग महिलाओं ने भी आशा देवी की सलाह को तरजीह दिया। आशा देवी को यह बदलाव लाने में काफी मेहनत करनी पड़ी।
    टीकाकारण को लेकर भ्रांतियों को किया दूर: कोढा ब्लॉक के कोलासी गांव में टीकाकारण को लेकर भी काफी भ्रांतियाँ फैली थी। टीका लगाने के बाद बच्चा बीमार पड़ जाता है। बच्चे को बुखार एवं उल्टी होती है। कुछ ऐसी ही भ्रांतियाँ टीकाकरण को लेकर फैली थी। आशा देवी ने इस पर भी बेहतर कार्य किया। गाँव के कई बच्चों के उदाहरण देकर उन्होंने टीकाकरण के करण होने वाले साइड इफैक्ट के विषय में लोगों को जागरूक किया। उनकी यह कोशिश भी कारगर साबित हुयी। पहले माताएँ जहाँ अपने बच्चे को टीकाकरण सत्र पर लेकर नहीं जाती थी, वही अब ग्रामीण स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण दिवस पर बच्चों की शत-प्रतिशत उपस्थिती रहती है।
    लोगों को समझना जरूरी : आशा देवी बताती हैं लोगों को जागरूक करने के लिए उन्हें अच्छी तरह समझना जरूरी है। कई बार लोग बदलना चाहते हैं लेकिन उन्हें बदलाव का कोई ठोस वजह नहीं समझ आता है। इसलिए उन्हें समझाने के लिए उनकी तरह सोचना भी जरूरी होता है। उन्होंने बताया 8 साल के कार्य-काल में उन्होंने लोगों के साथ भावनात्मक स्तर से जुडने में सफलता मिली। यही जुड़ाव इस बदलाव को सच करने में सहायक भी साबित हुआ। लोगों में टीकाकरण एवं संस्थागत प्रसव को लेकर जागरूकता में काफी इजाफ़ा हुआ है। जो सही दिशा में किए गए प्रयासों को दिखाता है।

    संवादक: अमन

    इसे भी पढ़े: पोषण माह अभियान के तहत पोषण मेला का हुआ आयोजन

    विवरण: अब गांव की स्थिति बदल चुकी है। आये दिन रात में एम्बुलेंस की आवाज आसानी से सुनी जा सकती है। प्रसव घर की जगह अस्पतालों में होने लगे हैं। कभी टीकाकरण के नाम से माताएं अपने बच्चे को घर में छिपा लेती थीं।

    0 टिप्पणियाँ:

    टिप्पणी पोस्ट करें